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आखिर कब तक ?

 इस समाज में आखिर कब तक हमें ऐसे रहना होगा ।               स्वतंत्र भारत हो कर भी,         आखिर क्यों हमें बंधी बनाया हैं ?  ।। आखिर कब तक इस समाज में लड़कों को ज्यादा सम्मान दिया जायेगा ? आखिर कब इस समाज से असम्मानता का कीड़ा जायेगा ? ।।    आखिर कब तक हमें इस समाज में रहने के लिये,                सरकार से भीख मांगनी पड़ेगी ।। आखिर कब तक हमें अपनी जिंदगी,            घुटन में और तनाव में काटनी होगी ।। आखिर कब वो दिन आयेगा जब हमें,    दूसरो पर निर्भर ना हो कर आत्म निर्भर बनाया जायेगा।। आखिर कब वो दिन आयेगा इस समाज में ?  जब हमें भी बराबर की हिस्सेदारी दी जायेगी और, हमारा भी सम्मान किया जायेगा।।
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शायरी

1= वक्त गुजारने के लिए लोगो ने की थी  हमसे बात ।  और हम समझ बैठे की ज़िंदगी साथ गुजारने की हो  रही है बात।। ( Waqt gujaarne ke liye logo ne ki thi  humse baat..... Or hum samjh bethe ki zindigi sath gujarne ki ho rahi hai baat.....) ••••••◆••••••◆••••••◆••••••◆••••••◆••••••◆••••••◆•••••• 2= अरे ये इश्क का दस्तूर ही कुछ एसा है।       किसी को डूबा  देती है,      तो किसी को बुलंदियो तक पोहचा देती है।। (Aree yee ishk ka dastur hi kuch aysa hai           Kisi ko duba deti hai to .....   Kisi ko bulandiyo tak pohachaa deti hai ....